Muskan Garg: रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वद्यालय के अंतर्गत टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रथम वर्ष के छात्रों ने शनिवार को एल.बी.टी. सभागार में “रबीन्द्रनाथ टैगोर कहानियों के तीन छोर” शीर्षक से एक सशक्त नाट्य प्रस्तुति देकर दर्शकों को साहित्य और रंगमंच की गहराइयों से रूबरू कराया। प्रख्यात रंगनिर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर के मार्गदर्शन में मंचित इस प्रस्तुति में गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की तीन कालजयी कहानियाँ ‘एक रात’, ‘रासमणि का बेटा’ और ‘अंतिम रात’ को अनूठी नाट्य भाषा में जीवंत किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में रंगमंच प्रेमी, साहित्यकार, विद्यार्थी और कला अनुरागी उपस्थित रहे।

कहानी 1: ‘एक रात’: मौन में पनपता प्रेम और आत्मिक पूर्णता:
‘एक रात’ बचपन के मित्र नायक और सुरबाला की उस अनकही प्रेमकथा को सामने लाती है, जो सामाजिक सीमाओं में बंधी होते हुए भी भीतर-ही-भीतर जीवित रहती है। पढ़ाई और समय के फेर में नायक पीछे छूट जाता है, सुरबाला का विवाह हो जाता है। संयोग से नायक की नियुक्ति उसी शहर में होती है। बाढ़ की एक रात दोनों को निर्जन स्थान पर आमने-सामने खड़ा कर देती है। पूरी रात मौन रहता है, कोई सीमा नहीं टूटती। सुबह पानी उतरता है और दोनों अलग हो जाते हैं। नायक को बोध होता है कि भले जीवन असफलताओं से भरा हो, पर उस एक रात में उसने प्रेम और आत्मिक पूर्णता का शाश्वत अनुभव पा लिया।
मंच पर उपस्थित थे: दुर्गेश कुमार, प्रकाश गंगवार, विजय सरदार, हर्ष बैजल, सुमित कुमार सागर, माधव सचदेव, पूर्णिमा कुमारी।

कहानी 2: ‘रासमणि का बेटा’: उम्मीद, दरिद्रता और टूटता विश्वास:
टैगोर की यह अत्यंत मार्मिक कहानी एक ऐसे परिवार की कथा है, जो कभी संपन्न था, पर समय के थपेड़ों में दरिद्रता की गहराइयों में जा गिरता है। परिवार के इकलौते पुत्र से एक खोए हुए वसीयतनामे को खोज लाने की उम्मीद बंधी है। सबको विश्वास है कि वही उन्हें बचा सकता है, लेकिन नियति कुछ और ही लिख चुकी होती है। यह कहानी मानवीय आशा, टूटते विश्वास और सामाजिक यथार्थ की करुण अभिव्यक्ति बनकर मंच पर उभरती है।
मंच पर उपस्थित थे: देवव्रत कुशवाह, आशुतोष अग्निहोत्री, दक्ष कौशिक, आर्यन पंत, करण कश्यप, धर्मवीर चौधरी, नम्रता यादव।

कहानी 3: ‘अंतिम रात’: मृत्यु के साये में जीवन का सत्य:
‘अंतिम रात’ टैगोर की गहरी मनोवैज्ञानिक कहानी है, जो मृत्यु की अंतिम घड़ी में मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व, पश्चाताप और आत्मबोध को उजागर करती है। केंद्रीय पात्र अपनी अंतिम रात में समझ पाता है कि जिन सांसारिक उपलब्धियों पर वह गर्व करता रहा, वे सब क्षणभंगुर हैं। उसे बोध होता है कि जीवन का वास्तविक मूल्य प्रेम, करुणा और मानवीय संबंधों में निहित है। अंतिम क्षणों में मृत्यु भय नहीं, बल्कि सत्य और मुक्ति के रूप में स्वीकार की जाती है।
मंच पर उपस्थित थे: ऋषभ मालवीय, अभिलाष बोरबोरह, लवकुश कुमार, अभय कुमार तिवारी, मिहिर कसेरा, विक्रम वर्मा, मानसी जायसवाल।

रचना से मंच तक: ‘कहानी का रंगमंच’ का प्रयोग:
इस प्रस्तुति में टैगोर की कहानियों का पारंपरिक नाट्य रूपांतरण नहीं किया गया बल्कि निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर ने इसे ‘कहानी का रंगमंच’ नाम दिया, जिसमें कहानी को उसके मूल स्वरूप में रखते हुए दृश्यात्मक अनुभव में बदला गया। अभिनेताओं ने शब्दों के भीतर उतरकर, बार-बार रचना और पुनर्रचना की प्रक्रिया से गुजरते हुए मंच पर नया दृश्य संसार रचा। बिना भव्य सेट, भारी संगीत या आडंबर के, कहानी के शब्द ही दृश्य बनते चले गए।

मंच के साथ:
• कहानी: रबीन्द्रनाथ टैगोर
• मार्गदर्शन: देवेन्द्र राज अंकुर
• मार्गदर्शन सहयोग: विक्रान्त भट्ट
• प्रकाश परिकल्पना: डॉ. चैतन्य आठले
• मंच व्यवस्था, वेशभूषा एवं प्रकाश संचालन: सोनू साहा
• सहयोग: अविजित सोलंकी, संतोष कौशिक, चैतन्य भट्ट, शरद मिश्रा, अशोक गौर, जीतमल

टैगोर: साहित्य, संगीत और संस्कृति का शिखर:
रबीन्द्रनाथ टैगोर आधुनिक भारतीय साहित्य और संस्कृति के महानतम रचनाकारों में से एक थे। ‘गीतांजलि’ के लिए 1913 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला, जिससे वह प्रथम एशियाई साहित्यकार बने। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, संगीत और चित्रकला हर विद्या में उनका योगदान अमूल्य है। भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान उनकी ही रचनाएँ हैं।

निर्देशक परिचय: देवेन्द्र राज अंकुर:
देवेन्द्र राज अंकुर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निर्देशन में विशेषज्ञता प्राप्त रंगकर्मी हैं। ‘संभव’ समूह के संस्थापक सदस्य और ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता प्रो. अंकुर सात से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं। टैगोर फेलोशिप और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, वह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक भी रह चुके हैं।

निर्देशकीय वक्तव्य:
निर्देशक के अनुसार, यह प्रक्रिया छात्रों के लिए सीखने और खोज का एक सतत अनुभव है। बिना किसी छेड़छाड़ के, कहानियों को उनके मूल रूप में मंच पर लाना ही इस प्रयोग का उद्देश्य है। अभिनेता, कहानी और दर्शक, इन तीनों के माध्यम से रंगमंच का सच्चा अनुभव रचा जा सकता है, और यही इस प्रस्तुति की आत्मा है।

“रबीन्द्रनाथ टैगोर”: कहानियों के तीन छोर” न केवल एक नाट्य प्रस्तुति थी, बल्कि साहित्य को देखने और महसूस करने की एक नई दृष्टि भी, जिसने दर्शकों को भीतर तक स्पर्श किया।

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