Muskan Garg: दिल्ली उच्च न्यायालय ने पारिवारिक जिम्मेदारियों और लैंगिक समानता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महिला का नौकरीपेशा होना उसे बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता, लेकिन इसी तरह पिता की जिम्मेदारी भी किसी हाल में कम नहीं हो सकती। यह टिप्पणी न सिर्फ कानून की दृष्टि से अहम है, बल्कि सामाजिक सोच को भी आईना दिखाती है।
मामला क्या था?
यह टिप्पणी एक ऐसे पारिवारिक विवाद के दौरान आई, जिसमें पति द्वारा यह दलील दी गई कि चूंकि पत्नी नौकरी कर रही है, इसलिए बच्चों की देखभाल और खर्च की जिम्मेदारी मुख्य रूप से उसी की होनी चाहिए। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों का पालन-पोषण केवल मां या पिता की नहीं, बल्कि दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की स्पष्ट सोच:
न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि आधुनिक समाज में महिलाओं का कामकाजी होना सामान्य बात है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि वे मातृत्व से जुड़े कर्तव्यों से मुक्त हो जाती हैं। साथ ही अदालत ने यह भी जोड़ा कि पिता की जिम्मेदारी को महिला की नौकरी के आधार पर कम नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “बच्चे दोनों माता-पिता की साझा जिम्मेदारी हैं। केवल मां से यह अपेक्षा करना कि वह नौकरी के साथ-साथ पूरी परवरिश की जिम्मेदारी निभाए, न तो न्यायसंगत है और न ही संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप।”
पितृत्व की भूमिका पर जोर:
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पितृत्व केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। भावनात्मक सहयोग, समय देना और बच्चों के विकास में सक्रिय भूमिका निभाना भी पिता की जिम्मेदारी है। किसी भी परिस्थिति में पिता अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।
समाज के लिए बड़ा संदेश:
यह फैसला उन रूढ़िवादी धारणाओं पर सीधा प्रहार है, जिनमें यह मान लिया जाता है कि बच्चे की पूरी जिम्मेदारी मां की होती है, खासकर तब जब वह नौकरीपेशा हो। कोर्ट की यह टिप्पणी लैंगिक समानता, पारिवारिक संतुलन और बच्चों के सर्वोत्तम हित को केंद्र में रखती है।
कानून से आगे एक सामाजिक चेतावनी:
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि समाज को दिया गया एक स्पष्ट संदेश है, कामकाजी महिला होना कोई छूट नहीं, और पिता होना कोई विकल्प नहीं। बच्चों का भविष्य तभी सुरक्षित हो सकता है, जब माता और पिता दोनों समान रूप से अपनी जिम्मेदारियां निभाएं।
