रोहित रजक, भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीदी 7 जुलाई से प्रारंभ की जा रही है, लेकिन इस निर्णय से किसान असमंजस में हैं।
राज्य सरकार ने इस खरीदी के लिए 3 लाख 51 हजार मीट्रिक टन का लक्ष्य तय किया है, मगर पंजीयन और तैयारियों में भारी असंतुलन की स्थिति देखी जा रही है। किसानों को न तो खरीदी केंद्रों की पर्याप्त जानकारी मिल पा रही है और न ही आवश्यक दस्तावेजों के सत्यापन की स्थिति स्पष्ट हो पाई है।
पंजीयन की अंतिम तारीख निकल गई, पर प्रक्रिया अधूरी
मूंग खरीदी के लिए किसानों को 26 जून तक पोर्टल पर पंजीयन कराना था, लेकिन पंजीकृत किसानों की संख्या, वास्तविक मूंग उत्पादन की तुलना में काफी कम है। इस कारण कई किसान अब भी परेशान हैं कि वे अपनी फसल सरकार को कैसे बेच पाएंगे। पंजीयन तो कर लिया गया, लेकिन सत्यापन नहीं हुआ, या दस्तावेजों में त्रुटि के कारण नाम सूची में नहीं आया।
समर्थन मूल्य तय, पर खुले बाजार में कीमत कम
इस वर्ष मूंग का समर्थन मूल्य 8,682 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि खुले बाजार में मूंग की कीमतें इससे कहीं कम, लगभग 6,000 से 6,500 रुपए प्रति क्विंटल चल रही हैं। किसान साफतौर पर लाभ के लिए समर्थन मूल्य पर बेचने को इच्छुक हैं, लेकिन सरकारी खरीदी की प्रक्रिया में जटिलताएं और देरी से उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है।
खरीदी केंद्रों की स्थिति भी स्पष्ट नहीं :
जिलेवार खरीदी केंद्रों की सूची अब तक पूरी तरह से सार्वजनिक नहीं हुई है। किसानों को नहीं पता कि उन्हें कहां फसल लेकर जानी है। केंद्रों पर इंतजामों की समीक्षा भी नहीं हुई, जिससे खरीदी के पहले ही दिन अव्यवस्था की आशंका जताई जा रही है।
क्या कहता है कृषि विभाग?
कृषि विभाग का कहना है कि सभी पात्र किसानों का पंजीयन हो चुका है और खरीदी की तैयारियां लगभग पूरी हैं। खरीदी केंद्रों पर व्यवस्था सुचारु रूप से की जा रही है। मूंग का भंडारण, तुलाई और भुगतान प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने के निर्देश दिए गए हैं।
किसानों की मांगें :
किसानों का कहना है कि जिन किसानों से पंजीयन छूट गया है, उन्हें एक और अवसर दिया जाना चाहिए। साथ ही जिनके दस्तावेजों में त्रुटि है या सत्यापन में परेशानी आई है, उन्हें तुरंत सहायता दी जानी चाहिए। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि खरीदी केंद्रों पर भ्रष्टाचार न हो और भुगतान समय पर हो।मूंग खरीदी की घोषणा से जहां किसानों को उम्मीद बंधी थी, वहीं अब जमीनी तैयारियों में कमी के कारण भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।
अगर सरकार समय रहते व्यवस्था सुधारती है, तो यह खरीदी अभियान किसानों को राहत दे सकता है। अन्यथा, समर्थन मूल्य का लाभ सिर्फ नाम मात्र रह जाएगा और किसान फिर से मंडियों में औने-पौने दामों पर फसल बेचने को मजबूर होंगे।

