Muskan Garg: बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी एक बार फिर अपने बयान को लेकर सुर्खियों में हैं। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि “कैंसर शरीर को खत्म करता है, लेकिन धर्मांतरण समाज और संस्कृति की जड़ों को नष्ट कर देता है, इसलिए यह कैंसर से भी ज्यादा खतरनाक है। ” उनके इस वक्तव्य ने धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है।
धर्मांतरण पर क्या बोले धीरेंद्र शास्त्री जी?
पंडित धीरेंद्र शास्त्री जी का कहना है कि जब किसी व्यक्ति का धर्मांतरण दबाव, लालच या भय के कारण होता है, तो वह केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज की सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित करता है। उन्होंने इसे “सांस्कृतिक आक्रमण” बताते हुए कहा कि इससे आने वाली पीढ़ियों की सोच और परंपराएं भी बदल जाती हैं।
उनके अनुसार,
“कैंसर का इलाज संभव है, लेकिन जब समाज की आत्मा बीमार हो जाए, तो उसे बचाना सबसे कठिन हो जाता है। ”
संस्कृति और आस्था की रक्षा की अपील:
शास्त्री जी ने अपने संबोधन में युवाओं से अपनी संस्कृति, परंपरा और सनातन मूल्यों से जुड़े रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि शिक्षा, सेवा और संवाद के माध्यम से समाज को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी व्यक्ति मजबूरी में अपने मूल विश्वासों से दूर न जाए।
समर्थन और विरोध मिली जुली प्रतिक्रियाएं:
इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।
• समर्थकों का कहना है कि शास्त्री जी ने एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दे को साहस के साथ उठाया है।
• वहीं आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की तुलना चिकित्सीय बीमारी और सामाजिक मुद्दे को एक तराजू में तौलना उचित नहीं है।
कुछ लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया है, तो कुछ ने इसे विवादास्पद करार दिया है।
बड़ा सवाल: संवाद या टकराव?
भारत में धर्मांतरण का मुद्दा लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है पर विशेषज्ञों का मानना है कि ताकि समाज में तनाव न फैले, इस पर बातचीत, संवेदनशीलता और संवैधानिक मूल्यों के साथ होनी चाहिए।
पंडित धीरेंद्र शास्त्री जी का यह बयान केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उनका यह बयान धर्म, पहचान और सामाजिक संरचना पर एक व्यापक बहस को जन्म देता है। चाहे कोई इससे सहमत हो या असहमत, इतना तय है कि यह विषय गंभीर सोच और संतुलित संवाद की मांग करता है। समाज को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि मतभेद हों, लेकिन समाधान शांति और समझदारी से निकाले जाएं।
